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ऑटिज्म से जूझ रहे 7 साल के बच्चे में उपचार के दौरान लौटी संवाद की क्षमता
4-5 माह में विकसित हुआ आई कॉन्टैक्ट, 7-8 माह बाद पहली बार बोला ‘मां’; सितंबर 2026 में क्लिनिक पहुंचकर डॉक्टर को किया नमस्कार, मां के अनुसार अब पूरे वाक्य बोल रहा है
इंदौर। ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर और गंभीर व्यवहार संबंधी समस्याओं से जूझ रहे 7 वर्षीय बच्चे में करीब एक वर्ष के दौरान सामने आए क्रमिक बदलाव ने उसके माता-पिता के साथ उपचार कर रहे चिकित्सक के लिए भी इसे एक महत्वपूर्ण क्लिनिकल अनुभव बना दिया। अगस्त 2025 में जब माता-पिता बच्चे को एडवांस्ड होम्यो हेल्थ सेंटर, गीता भवन रोड, इंदौर लेकर पहुंचे थे, तब उनके अनुसार बच्चे में सार्थक वर्बल कम्युनिकेशन नहीं था, आई कॉन्टैक्ट लगभग नहीं था और वह अत्यधिक चंचल एवं बेचैन रहता था।
परिवार की परेशानी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बच्चे के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए उसे घर में रस्सी से बांधकर रखने तक की स्थिति बन गई थी। माता-पिता लगातार इस बात को लेकर चिंतित रहते थे कि बच्चा कहीं घर से बाहर न निकल जाए या स्वयं को नुकसान न पहुंचा दे। उसकी गतिविधियों पर बार-बार रोक-टोक की जाती थी।
बदलाव अचानक नहीं, धीरे-धीरे आया
सीनियर होम्योपैथी फिजिशियन डॉ. ए.के. द्विवेदी के अनुसार, बच्चे के मामले में केवल उसके व्यवहार को देखकर दवा का चयन नहीं किया गया, बल्कि विस्तृत केस टेकिंग की गई। बच्चे के विकासात्मक इतिहास, व्यवहार, संवाद की स्थिति, सामाजिक प्रतिक्रिया, पारिवारिक परिस्थितियों तथा अन्य व्यक्तिगत विशेषताओं को उपचार की प्रक्रिया में शामिल किया गया।
केस टेकिंग के दौरान बच्चे की मां ने गर्भावस्था के समय अपने अत्यधिक मानसिक तनाव और अनिश्चितता के दौर का भी उल्लेख किया। इस इतिहास को चिकित्सकीय केस के एक हिस्से के रूप में देखा गया, न कि बच्चे की स्थिति का एकमात्र कारण माना गया।
डॉ. द्विवेदी ने बताया कि उपचार के साथ-साथ माता-पिता की काउंसलिंग पर भी विशेष जोर दिया गया। उन्होंने परिवार को स्पष्ट रूप से समझाया कि बच्चे को रस्सी से बांधकर रखना उचित नहीं है और उसके लिए सुरक्षित, स्नेहपूर्ण तथा सकारात्मक वातावरण तैयार करना जरूरी है। गंभीर व्यवहार संबंधी समस्या को देखते हुए परिवार को एलोपैथिक मनोचिकित्सक से परामर्श लेने की सलाह भी दी गई।
4-5 माह बाद आई कॉन्टैक्ट में सुधार
परिवार के अनुसार, होम्योपैथिक उपचार शुरू होने के लगभग 4-5 माह बाद बच्चे में आई कॉन्टैक्ट विकसित होना शुरू हुआ। माता-पिता के लिए यह पहला महत्वपूर्ण बदलाव था, क्योंकि प्रारंभ में बच्चा लोगों की ओर ठीक से देखता तक नहीं था।
इसके बाद लगभग 7-8 माह के दौरान बच्चे ने पहली बार अपनी मां को ‘मां’ कहकर पुकारा। मां के लिए यह क्षण बेहद भावुक और खुशी देने वाला था। उन्होंने चिकित्सक को बताया कि बच्चा अब उनके करीब आने लगा है और उनके साथ चिपककर सोने लगा है।
सितंबर 2026 में डॉक्टर के सामने किया ‘नमस्कार’
सितंबर 2026 में बच्चे की मां सतना से इंदौर फॉलोअप के लिए पहुंचीं। उन्होंने बताया कि अब बच्चा पूरे वाक्य बोलने लगा है, उसकी अत्यधिक चंचलता और व्यवहार संबंधी परेशानियों में भी काफी कमी आई है। परिवार के अनुसार बच्चे के शिक्षक और केयरटेकर भी उसके बदलाव से खुश हैं।
इसी फॉलोअप के दौरान चिकित्सक ने बच्चे के व्यवहार में स्वयं भी एक उल्लेखनीय अंतर देखा। बच्चा क्लिनिक के केबिन में आया, डॉ. ए.के. द्विवेदी को नमस्कार किया और उनके सामने रखी कुर्सी पर जाकर बैठ गया। प्रारंभिक मुलाकात में बच्चे की स्थिति और सितंबर 2026 में उसके व्यवहार के बीच यह अंतर चिकित्सक के लिए बेहद भावुक कर देने वाला क्षण रहा।
‘27 साल के चिकित्सकीय सफर में यह अनुभव विशेष रहा’
डॉ. द्विवेदी के अनुसार, अपने 27 वर्षों के चिकित्सकीय सफर में उन्होंने अनेक जटिल मामलों को देखा और उनका उपचार किया है, लेकिन इस बच्चे में आए क्रमिक बदलाव ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया।
उन्होंने कहा कि इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात केवल बच्चे का बोलना शुरू करना नहीं है, बल्कि उसके सामाजिक व्यवहार, मां के साथ भावनात्मक जुड़ाव, आई कॉन्टैक्ट और व्यवहार में दिखाई दे रहा क्रमिक परिवर्तन है। बच्चे के माता-पिता के चेहरे पर आई खुशी उनके लिए इस पूरे अनुभव का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।
उपचार अभी भी जारी, ‘ऑब्जर्वेशनल केस’ के रूप में किया जा रहा है दस्तावेजीकरण
डॉ. द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि बच्चे का होम्योपैथिक उपचार अभी भी जारी है और यह मामला “Ongoing Homoeopathic Treatment – Observational Case” के रूप में दस्तावेजित किया जा रहा है।
उनका कहना है कि एक अकेले केस के आधार पर किसी उपचार की प्रभावशीलता या उसके कारण हुए विकासात्मक बदलावों के बारे में अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। बच्चे की आगे की प्रगति को नियमित फॉलोअप के माध्यम से देखा और दस्तावेजित किया जा रहा है।
आगे के फॉलोअप में बच्चे की वर्बल कम्युनिकेशन, वाक्य निर्माण, आई कॉन्टैक्ट, सामाजिक व्यवहार, गतिविधि स्तर, व्यवहार नियंत्रण, स्कूल प्रदर्शन और केयरटेकर के साथ उसकी सहभागिता जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया जाएगा।
माता-पिता के लिए निराशा से उम्मीद तक का सफर
बच्चे के माता-पिता के लिए यह बदलाव केवल चिकित्सकीय रिपोर्ट का विषय नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण अनुभव है। शुरुआत में वे बच्चे के भविष्य को लेकर अत्यधिक चिंतित थे और उसके व्यवहार को संभालना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया था।
अब बच्चे के संवाद और व्यवहार में आए बदलाव ने परिवार में उसके भविष्य को लेकर नई उम्मीद पैदा की है। माता-पिता ने उपचार, मार्गदर्शन और काउंसलिंग के लिए डॉ. द्विवेदी के प्रति आभार व्यक्त किया तथा कहा कि वे चाहते हैं कि ऑटिज्म और अन्य विकासात्मक समस्याओं से जूझ रहे परिवारों के लिए भी जागरूकता और सहयोग का काम किया जाए।
डॉक्टर बोले- बच्चे को बांधना नहीं, समझना जरूरीडॉ. द्विवेदी का कहना है कि ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के साथ परिवार और समाज का व्यवहार अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे बच्चों को केवल उनके व्यवहार के आधार पर नियंत्रित करने के बजाय उनकी आवश्यकताओं को समझना, सुरक्षित वातावरण देना, धैर्य रखना और आवश्यकता के अनुसार चिकित्सकीय, स्पीच एवं विकासात्मक सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है।
वे कहते हैं, “हर बच्चे में संभावनाएं होती हैं। हमें उसके व्यवहार के पीछे की जरूरत को समझने की कोशिश करनी चाहिए और परिवार को भी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।”
होम्योपैथी में विस्तृत केस टेकिंग पर जोर
डॉ. द्विवेदी के अनुसार, होम्योपैथिक चिकित्सा में विशेष रूप से ऐसे जटिल मामलों में केवल बीमारी के नाम के आधार पर दवा निर्धारित करने के बजाय विस्तृत केस टेकिंग, व्यक्तिगत लक्षणों का अध्ययन, दवा का चयन, potency एवं dose का निर्धारण, dose की repetition तथा संभावित maintaining factors को पहचानना महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस मामले में भी उपचार के साथ नियमित फॉलोअप और परिवार के व्यवहार संबंधी मार्गदर्शन को महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया।
चिकित्सक परिचय
डॉ. ए.के. द्विवेदी, सीनियर होम्योपैथी फिजिशियन, एडवांस्ड होम्यो हेल्थ सेंटर एवं होम्योपैथिक मेडिकल रिसर्च प्रा. लि., इंदौर से जुड़े हैं। वे केंद्रीय होम्योपैथिक अनुसंधान परिषद (CCRH), आयुष मंत्रालय, भारत सरकार की सेंट्रल एथिकल कमेटी के सदस्य तथा नॉर्थ ईस्टर्न इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद एंड होम्योपैथी (NEIAH), शिलॉन्ग की साइंटिफिक एडवाइजरी कमेटी के सदस्य हैं।


